भारत में प्रधानमंत्री की बढ़ती शक्तियाँ संसदीय लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों को प्रभावित कर रही हैं। अनुच्छेद 74-75 के व्यापक विवेकाधिकार का दुरुपयोग लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वतंत्रता को कमजोर करता है।
प्रधानमंत्री की शक्तियों में विस्तार के कारण

इसलिए, भारत में प्रधानमंत्री की शक्तियों का विश्लेषण आवश्यक है।
संवैधानिक प्रावधान :
अनुच्छेद 74 के तहत मंत्रिपरिषद का मुखिया होने से व्यापक अधिकार। इसलिए राष्ट्रपति प्रधानमंत्री की सलाह मानने को बाध्य।
PMO का संस्थागत विकास :
1980 के बाद प्रधानमंत्री कार्यालय ने नीति निर्माण में केंद्रीय भूमिका। उदाहरण – नीति आयोग का PMO के अधीन कार्यकरण।
पार्टी प्रणाली :
एकदलीय बहुमत से संसदीय नियंत्रण कमजोर। उदाहरण – 2014-24 में BJP के पूर्ण बहुमत से विपक्ष की सीमित भूमिका।
मीडिया प्रभाव :
व्यक्तित्व-केंद्रित राजनीति से प्रधानमंत्री की छवि मजबूत। उदाहरण – ‘मन की बात’ जैसे कार्यक्रम से जनता से सीधा संपर्क।
निर्णय प्रक्रिया :
महत्वपूर्ण नीतियों में व्यक्तिगत पहल। उदाहरण – नोटबंदी 2016 में सीमित मंत्रिमंडलीय परामर्श।
लोकतांत्रिक संस्थानों पर नकारात्मक प्रभाव
संसदीय निरीक्षण :
विपक्ष की जवाबदेही तय करने की क्षमता घटी। उदाहरण – 2024 लोकसभा चुनाव में कम बैठकें और सीमित चर्चा।
स्वतंत्र संस्थाएँ :
CBI, ED जैसी एजेंसियों पर राजनीतिक दबाव। उदाहरण – विपक्षी नेताओं की चुनिंदा जाँच से न्यायिक चिंताएँ ।
संघवाद :
राज्य सरकारों के साथ केंद्र के संबंधों में तनाव। उदाहरण – दिल्ली-केंद्र विवाद में अनुच्छेद 239AA की व्याख्या।
न्यायपालिका संबंध :
न्यायाधीशों की नियुक्ति में कार्यपालिका का बढ़ता प्रभाव। उदाहरण – कॉलेजियम सिस्टम vs NJAC विवाद।
सुधार के सुझाव
इसके अलावा, संसदीय सुधार भी आवश्यक है।
संसदीय सुधार :
प्रश्नकाल को अधिक प्रभावी बनाना और स्थायी समितियों की भूमिका बढ़ाना।
संस्थागत स्वायत्तता :
CVC, CBI जैसी संस्थाओं के लिए वैधानिक सुरक्षा।
पारदर्शिता :
सूचना का अधिकार को मजबूत करना और PMO की जवाबदेही बढ़ाना।
संवैधानिक संशोधन :
अनुच्छेद 74 में स्पष्टीकरण जोड़कर मंत्रिपरिषद की सामूहिक जिम्मेदारी सुनिश्चित करना।
आगे की राह :
हालाँकि यहाँ संतुलित शक्ति वितरण आवश्यक है। अनुच्छेद 19 की मूल भावना के अनुरूप संस्थागत सुधार से भारतीय लोकतंत्र मजबूत होगा। परिणामस्वरूप, संतुलित शक्ति वितरण आवश्यक है।
निष्कर्ष
अतः संक्षेप में, प्रधानमंत्री की बढ़ती शक्तियाँ भारतीय लोकतंत्र के लिए एक महत्वपूर्ण विषय है। इसलिए संस्थागत सुधार आवश्यक है। परिणामस्वरूप, अनुच्छेद 74 में स्पष्टता और मंत्रिपरिषद की सामूहिक जिम्मेदारी सुनिश्चित करना जरूरी है। इसके अलावा, CBI और ED जैसी संस्थाओं की स्वायत्तता बनाए रखना लोकतंत्र की मजबूती के लिए अनिवार्य है।
UPSC परीक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण बिंदु
प्रधानमंत्री की शक्तियाँ GS Paper 2 का महत्वपूर्ण topic है। इसके अलावा, यह topic राज्य PCS परीक्षाओं में भी पूछा जाता है। परिणामस्वरूप, इस विषय की गहरी समझ आवश्यक है। अनुच्छेद 74, 75 और PMO की भूमिका पर विशेष ध्यान दें।
तुलनात्मक अध्ययन
ब्रिटेन में प्रधानमंत्री की शक्तियाँ संसद के प्रति जवाबदेह हैं। इसके विपरीत, भारत में PMO का प्रभाव अधिक केंद्रीकृत हो गया है। इसलिए दोनों देशों की प्रणालियों का तुलनात्मक अध्ययन महत्वपूर्ण है।
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स्रोत: Parliament of India