भारतीय संविधान में न्यायपालिका को स्वतंत्र एवं मजबूत बनाने के लिए कई सुरक्षा कवच दिए गए हैं। इनमें से सबसे मजबूत कवच है—न्यायाधीश को हटाने का एकमात्र तरीका महाभियोग (Impeachment) होना। अनुच्छेद 124(4) और अनुच्छेद 217(1)(b) के तहत उच्चतम न्यायालय एवं उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों को केवल साबित कदाचार (proved misbehaviour) या अक्षमता (incapacity) के आधार पर हटाया जा सकता है। स्वतंत्र भारत के 75+ वर्षों में एक भी न्यायाधीश महाभियोग के जरिए पद से हटाया नहीं गया है। लेकिन हाल के वर्षों में इस प्रक्रिया पर बहस फिर से तेज हो गई है।
महाभियोग की संवैधानिक प्रक्रिया
1. आधार: साबित कदाचार या अक्षमता
2. प्रस्ताव की शुरुआत
लोकसभा में कम से कम 100 सांसद या राज्यसभा में कम से कम 50 सांसद
3. स्वीकार्यता: लोकसभा स्पीकर या राज्यसभा सभापति तय करते हैं
4. जाँच समिति
प्रस्ताव स्वीकार होने पर न्यायाधीश जाँच अधिनियम, 1968 के तहत तीन सदस्यीय जाँच समिति गठित होती है। इसमें भारत के मुख्य न्यायाधीश या सुप्रीम कोर्ट के अन्य न्यायाधीशों में से एक, हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीशों में से एक और लोकसभा अध्यक्ष या राज्यसभा सभापति की राय में एक विशिष्ट विधिवेत्ता शामिल होते हैं। समिति आरोपों की जाँच करके अपनी रिपोर्ट देती है।
5. संसद में मतदान
प्रत्येक सदन में प्रस्ताव को उस सदन की कुल सदस्य संख्या के बहुमत और उपस्थित तथा मतदान करने वाले सदस्यों के कम-से-कम दो-तिहाई बहुमत, दोनों का समर्थन चाहिए। दोनों सदनों के समावेदन उसी सत्र में राष्ट्रपति के समक्ष प्रस्तुत किए जाने चाहिए। इसके बाद राष्ट्रपति हटाने का आदेश जारी कर सकते हैं।
6. अंतिम कदम: राष्ट्रपति द्वारा हटाने का आदेश
यह प्रक्रिया जानबूझकर बहुत कठिन बनाई गई है ताकि न्यायपालिका पर राजनीतिक दबाव न पड़े।
अब तक के प्रमुख महाभियोग प्रस्ताव
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| न्यायाधीश | वर्ष | पद | मुख्य आरोप | परिणाम |
| जस्टिस वी. रामास्वामी | 1991–93 | सुप्रीम कोर्ट | वित्तीय अनियमितताएँ, भव्य खर्च | लोकसभा में प्रस्ताव असफल |
| जस्टिस सौमित्र सेन | 2011 | कलकत्ता हाई कोर्ट | धन गबन | राज्यसभा में पास, लेकिन इस्तीफा |
| जस्टिस पी.डी. दिनाकरण | 2011 | सिक्किम हाई कोर्ट | विभिन्न आरोप | प्रस्ताव आगे नहीं बढ़ा |
| जस्टिस सी.वी. नागार्जुन रेड्डी | 2017 | आंध्र-तेलंगाना हाई कोर्ट | विभिन्न आरोप | प्रस्ताव रुका |
| जस्टिस यशवंत वर्मा | 2025–26 | इलाहाबाद हाई कोर्ट | दिल्ली के आधिकारिक आवास के स्टोररूम में आग के बाद नकदी मिलने और उसके स्रोत व निस्तारण से जुड़े आरोप। | अगस्त 2026 की समाचार रिपोर्टों के अनुसार, अप्रैल 2026 में इस्तीफा दिया; अगस्त 2026 में संसद में पेश वैधानिक जाँच समिति की रिपोर्ट में आरोप सिद्ध पाए गए। इसे संसद द्वारा पद से हटाए जाने का मामला नहीं माना जाना चाहिए। |
वर्तमान संदर्भ: जस्टिस यशवंत वर्मा मामला
14 मार्च 2025 को दिल्ली स्थित जस्टिस यशवंत वर्मा के आधिकारिक आवास में आग लगी। इसके बाद स्टोररूम में नकदी मिलने से जुड़े आरोप सामने आए। सुप्रीम कोर्ट ने 22 मार्च 2025 को इन आरोपों की जाँच के लिए आंतरिक जाँच समिति गठित की। उस समय वे दिल्ली हाई कोर्ट के न्यायाधीश थे।
सुप्रीम कोर्ट की आंतरिक जाँच और न्यायाधीश जाँच अधिनियम, 1968 के तहत संसदीय जाँच अलग प्रक्रियाएँ हैं। आंतरिक जाँच अपने-आप न्यायाधीश को पद से नहीं हटाती। संसदीय प्रक्रिया में वैधानिक समिति की जाँच, दोनों सदनों का निर्धारित बहुमत और राष्ट्रपति का आदेश आवश्यक होते हैं।
अगस्त 2026 में प्रकाशित रिपोर्टों के अनुसार, जस्टिस वर्मा ने 9 अप्रैल 2026 को इस्तीफा दिया था। इसके बावजूद लोकसभा अध्यक्ष द्वारा गठित वैधानिक जाँच समिति ने अपनी जाँच पूरी की। उसकी रिपोर्ट 12 अगस्त 2026 को संसद में पेश हुई और उसमें आरोप सिद्ध पाए गए। इसलिए मामले को केवल “जाँच समिति गठित, प्रक्रिया जारी” लिखना अब अधूरा है।
परीक्षा के लिए ध्यान रखें: आरोप लगना, समिति द्वारा आरोप सिद्ध पाया जाना, न्यायाधीश का इस्तीफा और संविधान की प्रक्रिया से पद से हटाया जाना अलग-अलग स्थितियाँ हैं। इन्हें एक ही परिणाम के रूप में नहीं लिखना चाहिए।
स्रोत की सीमा: 2026 के घटनाक्रम समाचार स्रोतों से जाँचे गए हैं। संसद में पेश मूल रिपोर्ट की प्रति अलग से सत्यापित नहीं हुई है। यही सीमा अंतिम भाग पर भी लागू है।
स्रोत: स्रोत: अधिनियम की धारा 3
स्रोत: सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक जानकारी
सुप्रीम कोर्ट: 22 मार्च 2025 की प्रेस विज्ञप्ति
विज्ञप्ति और संलग्न रिपोर्ट: मूल घटना 14 मार्च 2025
Hindustan Times: इस्तीफे के बाद जाँच और रिपोर्ट
The Hindu: समिति की रिपोर्ट में आरोप सिद्ध